
चतरा मे चैत्र नवरात्रि के पहले दिन सुबह-सुबह कठौतिया तालाब पर वैसा नजारा था मानो पूरा चतरा ही श्रद्धा के रंग में रंग गया हो। विक्रम संवत 2083 का आगाज़ होते ही हजारों भक्त पवित्र स्नान को उमड़ पड़े। ठंडे पानी में डुबकी लगाते हुए सबने सूर्य देव को अर्घ्य चढ़ाया और नए साल की मंगलकामनाएं कीं। हवा में गूंज रहा था—’विक्रम संवत की जय! हिंदू नववर्ष की जय!’प्रजापति स्वयंसेवक संघ के योद्धाओं ने इस मौके को और खास बना दिया। संघ के इंद्रו प्रजापति ने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा की अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनकी परंपराओं का बोझ आज भी कुछ लोग ढो रहे हैं। हमारा असली नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है—ये वैज्ञानिक भी है, प्रकृति के साथ तालमेल रखने वाला भी।” उनके शब्दों ने हर किसी के दिल को छू लिया। मनोज कुमार समेत सैकड़ों भक्तों ने संकल्प लिया कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय पंचांग और सनातन संस्कृति की गहराई सिखाएंगे।पूजा-अर्चना के बाद सबने एक-दूसरे को गले लगाकर नववर्ष की बधाई दी। ये दृश्य बयां कर गया कि आधुनिकता के दौर में भी हमारी जड़ें कितनी मजबूत हैं। चतरा ने एक बार फिर साबित कर दिया—परंपराएं अमर हैं!
