
Chatra : लावालौंग प्रखंड क्षेत्र में शरद पूर्णिमा को लेकर इस वर्ष श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिला।कभी सुदूरवर्ती प्रखंड के रूप में पहचाने जाने वाले लावालौंग में भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने लोगों को इस पर्व की धार्मिक एवं आध्यात्मिक विशेषताओं से रूबरू कराने में अहम भूमिका निभाई।सोशल मीडिया के माध्यम से शरद पूर्णिमा के महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं की जानकारी मिलने के बाद लोग पूरे दिन विधि-विधान से पर्व मनाने की तैयारियों में जुटे रहे।खासकर रात में चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा को लेकर लोगों में विशेष उत्सुकता रही। इस संबंध में आचार्य अमित कुमार मिश्रा ने बताया कि हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।मान्यता है कि वर्षभर में शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात चंद्रमा की किरणों को अमृततुल्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर भजन,पूजन एवं आराधना करने वाले श्रद्धालुओं पर अपनी कृपा बरसाती हैं।इसी कारण इसे कोजागरी कहा जाता है।’कोजागरी’ का भाव है- कौन जाग रहा है।आचार्य ने बताया कि शरद पूर्णिमा का भगवान श्रीकृष्ण से भी विशेष संबंध है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी पूर्णिमा की चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था।इसलिए इसे रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।यह पर्व प्रकृति,भक्ति,प्रेम और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर रातभर खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।मान्यता है कि चंद्रमा की अमृतमयी किरणों के संपर्क में आने से खीर में विशेष गुण उत्पन्न होते हैं और अगले दिन सुबह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है।धार्मिक दृष्टिकोण से इसे अमृत प्रसाद माना जाता है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंद्रमा की रोशनी,शरद ऋतु के अनुकूल वातावरण और इस परंपरा के सांस्कृतिक महत्व को समझने की जरूरत है।अमित कुमार मिश्रा के अनुसार शरद पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं,बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत,पारिवारिक एकजुटता और प्रकृति के प्रति जुड़ाव का भी प्रतीक है।आधुनिक दौर में सोशल मीडिया के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी परंपराओं और पर्व-त्योहारों की महत्ता जानने का अवसर मिल रहा है।यही वजह है कि लावालौंग जैसे ग्रामीण एवं सुदूरवर्ती क्षेत्र में भी इस वर्ष शरद पूर्णिमा को लेकर लोगों में विशेष जागरूकता और उत्साह देखने को मिला।
रिपोर्टर मो0 साजिद
