
चतरा : टीएसपीसी के सुप्रीमो बृजेश गंझू उर्फ गोपाल गंझू उर्फ सरदार जी की मौत उत्तरप्रदेश के बनारस में एटीएस के मुठभेड़ में हो चुकी है ।टीपीसी सुप्रीमों बृजेश गंझू उर्फ गोपाल गंझू उर्फ सरदार जी, पिता पच्चू गंझू मूलतः चतरा जिला के लावालौंग थाना क्षेत्र लुटू सुहावन गांव के रहने वाले थे।इनके चार भाई हैं जिसमें बड़े भाई गणेश गंझू 2014 में जेवीएम पार्टी से चुनाव जीत कर विधायक भी रहे हैं। जबकि भाई में बृजेश गंझू मझले थे और दो छोटे भाई भी हैं इनके तीन बहन हैं। टीपीसी के सुप्रीमो बृजेश गंझू के तीन पत्नियां में एक भोगता समाज एक साहू समाज एक यादव समाज की हैं जिसमें यादव समाज के पत्नी साथ बनारस में रह रहे थे।दो पत्नियां में कई बच्चे हैं बाकी एक यादव समाज की पत्नी का बच्चे नहीं की जानकारी है। बृजेश गंझू प्रथम में लावालौंग से वार्ड सदस्य का चुनाव निर्विरोध जीत हासिल किए थे वहीं लावालौंग के पूर्वी क्षेत्र से पंचायत समिति का भी चुनाव की जीत हासिल की थी किंतु उग्रवादी संगठन होने के कारण इनका चुनाव को रद्द कर दिया गया था। गोपाल गंझू उर्फ बृजेश उर्फ सरदार जी टीपीसी के कार्यकाल में रहते हुए अपने नाम का लावालौंग में जेएसबी कॉलेज का निर्माण किया था था।जिसे एनआई द्वारा 2022 में शील किया जा चुका है।
तृतीय प्रस्तुति कमिटी और झारखंड प्रस्तुति कमिटी का जन्म
2001 में माओवादी संगठन से विद्रोह कर बृजेश गंझू , रामपति गंझू, कलजीत गंझू अलग होकर माओवादी से बाहर हो गए थे।
माओवादी में विद्रोह का कारण
माओवादीयों में अधिकतर बंगाल के लोग शीर्ष लीडर के रूप में रहा करते थे। जबकि झारखंड उस समय अलग नहीं हुआ था। झारखंड से लिए गए ठीकेदारों से लेवी का रुपया सीधा बंगाल शीर्ष लीडरों के पास चला जाता था।जिसे लेकर बृजेश गंझू, रामपति गंझू, कलजीत गंझू ने विद्रोह किया और अलग हो गए।
टीपीसी और जेपीसी का उग्रवादी सफर की शुरुवात
तृतीय प्रस्तुति कमिटी और झारखंड प्रस्तुति कमिटी का जन्म 2002 में सिमरिया थाना के फॉरेस्ट आइवी से शुरुवात की गई थी।हालांकि तीनों शीर्ष लीडर बनने के होड़ में दो अलग अलग पार्टी का गठन कर लिया। जिसमें टीपीसी संगठन का संचालन करने लगे बृजेश गंझू और जेपीसी संगठन का संचालन कलजीत गंझू और रामपति गंझू ने किया। टीपीसी और जेपीसी का क्षेत्रवार बंटवारा में चतरा मुख्य मार्ग से सिमरिया टंडवा मुख्य मार्ग के पक्षिम टीपीसी और पूरब जेपीसी का दबदबा बना रहा।
2003 में टीपीसी और जेपीसी संगठन का सहयोग चतरा पुलिस कप्तान और हजारीबाग के पुलिस कप्तान के द्वारा माओवादियों को परास्त करने के उद्देश्य से किया जाने लगा । इसी बीच टीपीसी और जेपीसी के आपसी मतभेद में एक दूसरे पर जानलेवा हमला होने के कारण जेपीसी संगठन टूटता चला गया और जेपीसी के सुप्रीमो कलजीत गंझू माओवादी काउंटर में मारे गए। जिसके बाद जेपीसी धीरे धीरे। विलुप्त हो गया। इधर टीपीसी सुप्रीमो गोपाल गंझू उर्फ बृजेश उर्फ सरदार जी का माओवादी से टीपीसी का सफर और अंत
2001 में माओवादी से विद्रोह कर बृजेश गंझू ने बनाया था टीपीसी संगठन
सिमरिया के फॉरेस्ट आइवी से बृजेश गंझू ने चार छः साथियों के साथ टंडवा के साराढू जंगल से की थी टीपीसी संगठन की सफर
टंडवा कोल कंपनी और एनटीपीसी के आने से लेवी में इजाफा
टंडवा और पिपरवार कोल परियोजना कंपनी से लेवी में काफी इजाफा हुआ जिसके कारण टेरर फंडिंग के मामले में टीपीसी के शीर्ष लीडरों के
अलावे कई टंडवा क्षेत्र के लोगों का नाम सामने आया ।जहां आज सजाआपत्ता के जिंदगी जेल में कुछ लोग काट रहे हैं। जिसमें टीपीसी के अन्य लोगों के अलावे सुप्रीमो बृजेश गंझू उर्फ सरदार जी उर्फ गोपाल गंझू का नाम भी शामिल था। वहीं पुलिस द्वारा इनके प्रति 30 लाख का इनाम भी घोषित किया गया था। एनआई से बचने के लिए अपने निश्चित ठिकानो पर बचने की कोशिश की जाती रही। परंतु नहीं बच पाए बृजेश गंझू । हालांकि पुलिस द्वारा कई बार सिलेंडर नीति के तहत सिलेंडर करने की ऑफर दी गई परंतु सिलेंडर नहीं किए। इसी बीच पुलिस के दबाव में पुलिस ने छापेमारी में बृजेश जी के ठिकाने से कई जर्मन हथियार भी पकड़े गए।
संपति में के मामले में चतरा जिले में इनका नाम प्रथम दर्जे में शामिल है
बृजेश गंझू और इनके भाइयों तथा इनके पत्नियों एवं इनके रिश्तेदार के अलावे चहेते दोस्तों के नाम से अरबों की संपति मौजूद है। इनामी बृजेश का मकान दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जैसे कई राज्यों एवं महानगरों में मकान एवं रेस्टोरेंट मौजूद है। वहीं भूमि की बात करें तो चतरा, सिमरिया, लावालौंग, हजारीबाग, टंडवा में हजारों एकड़ भूमि रिश्तेदारों भाइयों एवं दोस्तों के नाम से मौजूद है। इनके दोस्तो के नाम से कई बसें, ट्रक आदि आज भी चलाया जा रहा है।
अकूत संपति अर्जित में माओवादी ,जेपीसी छोड़ टीपीसी सबसे आगे
उग्रवादियों की संपति की बात करे तो सबसे ज्यादा संपति लेवी के माध्यम से अर्जित करने में तृतीय प्रस्तुति कमिटी संगठन आगे रहा है। टीपीसी के कोई भी शीर्ष लीडर ऐसा नहीं है जिनके पास करोड़ों का संपति ना हो।चाहे एरिया कमांडर हों या रीजनल कमांडर हों या जोनल कमांडर हो सभी के पास लेवी द्वारा की गई अर्जित अकूत संपति में आगे हैं। इस तरह अंत में टीपीसी की कहानी मुख्यतः 2002 में गठन 2007,2013 में विस्तार और माओवादियों से संघर्ष 2016,18 में मगध-अम्रपाली टेरर-फंडिंग/NIA जांच 2019 के बाद बढ़ता सुरक्षा दबाव 2024,25 में गिरफ्तारियां शुरू, धीरे धीरे संगठनात्मक कमजोरी जारी 20 सितंबर 2026 को बृजेश गंझू की मौत उत्तरप्रदेश के बारानसी में होने से टीपीसी का अंत माना जा रहा है।
