
चतरा जिले के कान्हाचट्टी प्रखंड अंतर्गत बिहार सीमा से सटा सुदूरवर्ती बनियाबांध गांव आज विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। कभी यह इलाका नक्सलवाद और अफीम माफियाओं के प्रभाव के लिए कुख्यात था, लेकिन अब वही गांव अपने परिश्रम और कौशल के बल पर सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुका है।एक समय था जब नक्सली यहां अदालतें लगाकर अपने कानून के तहत फैसले सुनाते थे। प्रशासन और सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के बाद यह इलाका धीरे-धीरे नक्सली प्रभाव से मुक्त हुआ। उसके बाद अफीम माफियाओं ने ग्रामीणों को पोस्ता की खेती के लिए उकसाया, जिससे कई परिवार अवैध गतिविधियों में फंसते चले गए।प्रशासन ने इसे गंभीरता से लेते हुए व्यापक जागरूकता अभियान चलाया और ग्रामीणों को वैकल्पिक रोजगार की दिशा में प्रेरित किया। परिणामस्वरूप, आज अनियाबांध के लोग बांस उत्पादों जैसे टोकरी, सूप और अन्य हस्तशिल्प बनाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। इस बदलाव ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत किया है और समाज की मुख्यधारा से भी जोड़ा है।ग्रामीणों का कहना है कि उनके सबसे बड़े संघर्ष अब बाजार से जुड़े हैं। खराब सड़कों और परिवहन की कमी के कारण वे अपने उत्पादों को उचित मूल्य पर नहीं बेच पाते। मजबूरन उन्हें महाजनों को सस्ते दामों में सामान बेचना पड़ता है।ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि गांव में सड़क, भंडारण और बाजार की सुविधाएं जल्द मुहैया कराई जाएं। साथ ही, उन्हें अपने पारंपरिक कौशल को और उन्नत करने के लिए प्रशिक्षण और संसाधन भी दिए जाएं।यह गांव अब इस बात का प्रमाण बन चुका है कि जब इच्छाशक्ति और सहयोग मिल जाए, तो किसी भी अंधकारमय इतिहास को उजाले में बदला जा सकता है।
