
चतरा जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। लंबे समय से विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सिविल सर्जन जगदीश प्रसाद का आखिरकार तबादला कर दिया गया है। यह कार्रवाई तब तेज हुई जब क्षेत्रीय विधायक जनार्दन पासवान ने लगातार शिकायतें उठाईं और मामले में हस्तक्षेप किया।
सूत्रों के मुताबिक, सिविल सर्जन के कार्यकाल के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं में भारी अनियमितताओं के आरोप लगे। इनमें निजी अस्पतालों से मिलीभगत, सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग और मरीजों को सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी संस्थानों की ओर मोड़ने का दबाव शामिल है। इससे आम लोगों को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि उनके कार्यकाल में जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और अव्यवस्था आम बात बन गई थी। लगातार शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक कार्यशैली पर भी सवाल खड़े करता है।
बताया जाता है कि पूर्व में भी विवादों के चलते उनका तबादला किया गया था, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण उनकी वापसी हो गई थी। वापसी के बाद हालात सुधरने की बजाय और बिगड़ते गए, जिससे जनाक्रोश बढ़ता गया।
अब सरकार की ओर से किए गए इस तबादले को एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई माना जा रहा है। साथ ही पूरे मामले की जांच तेज कर दी गई है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और इसमें संलिप्त निजी संस्थानों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कई चर्चित चेहरों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है और जेल जाना भी तय माना जा रहा है।
इस मामले में एक अहम पहलू यह भी सामने आया है कि यदि बिना प्रशासनिक स्वीकृति के किसी बिल का भुगतान हुआ है, तो उसमें शामिल लेने और देने वाले दोनों पक्षों को दोषी माना जाएगा। ऐसे मामलों की भी गहन जांच की जा रही है।
इधर, नए सिविल सर्जन डॉ. सत्येंद्र कुमार सिन्हा को चतरा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ जिले की बिगड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे।
चतरा में यह घटनाक्रम सिर्फ एक तबादला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा संकेत है। अब सबकी निगाहें जांच के नतीजों और दोषियों पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।
इस लुट कांड में संलिप्त निजी संस्थान के लुटेरों को भी जेल जाना तय है अगर बिना प्रशासनिक स्वीकृति का कोई बिल का भुगतान होता है तो लेने और देने वाले दोनों दोषी होंगे।
संवाददाता, प्रवीण कुमार सिंह
