
चतरा। कहते हैं कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, लेकिन झारखंड के चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के लिए यह ‘धन’ महज एक सपना बनकर रह गया है। यहाँ एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पिछले 13 सालों से अपना वजूद तलाश रहा है। करोड़ों की लागत से शुरू हुआ निर्माण आज खंडहर और झाड़ियों का घर बन चुका है। बीमार लोग मिलों का सफर तय करने को मजबूर हैं, लेकिन इस अधूरे भवन की ईंटें आज भी सरकारी तंत्र से सवाल पूछ रही हैं। क्या है पूरा मामला? यह तस्वीर चतरा के प्रतापपुर प्रखंड अंतर्गत यादव नगर टंडवा की है। इस जर्जर इमारत को देखकर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि यह लोगों की जान बचाने के लिए बनाया गया एक ‘स्वास्थ्य केंद्र’ था। साल 2012… यह वो साल था जब ग्रामीणों की आँखों में एक उम्मीद जगी थी कि अब इलाज के लिए शहर नहीं जाना पड़ेगा। निर्माण शुरू हुआ, ढांचा खड़ा हुआ, लेकिन विकास का पहिया अचानक थम गया। आज 13 साल बाद, यह भवन उपेक्षा की ऐसी मार झेल रहा है कि यहाँ खिड़कियों की जगह झाड़ियाँ उगी हैं और दरवाजों की जगह वीराना पसरा है।साहब, हमें मामूली बुखार भी होता है तो 10-20 किलोमीटर दूर भागना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही जान का जोखिम बना रहता है। यह अस्पताल बन जाता तो हमारी आधी मुसीबतें खत्म हो जातीं। रात के समय यहाँ आने में डर लगता है। यह अधूरा भवन अब असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। चारों ओर जंगल है। हमने कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन मिला तो सिर्फ आश्वासन। सवाल यह है कि जो पैसा जनता की गाढ़ी कमाई से निकला, वह आखिर कहाँ गया? क्या विभाग निर्माण कराकर भूल गया? यादव नगर और आसपास की हजारों की आबादी आज भी बुनियादी इलाज के लिए निजी क्लीनिकों या झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे है। गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल ले जाते समय कई बार रास्ते में ही हालात नाजुक हो जाते हैं। विडंबना देखिए, जिस भवन को जीवन देना था, वह खुद अपनी मौत पर आँसू बहा रहा है। यह मामला अब मेरे संज्ञान में आया है। यह बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं इस पूरे मामले को लेकर चतरा के सिविल सर्जन जगदीश प्रसाद और उपायुक्त कृति श्री से तत्काल मुलाकात करूँगा। मैं उनसे जवाब मांगूँगा कि आखिर फंड आवंटित होने के बाद भी यह भवन खंडहर क्यों बना रहा? इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था की यही हकीकत है। राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह संवेदनहीन हो चुके हैं। मैं सुनिश्चित करूँगा कि इस भवन का निर्माण जल्द पूरा हो और यहाँ डॉक्टर-नर्सों की तैनाती की जाए।”
सांसद की बातों में जहाँ आश्वासन है, वहीं राज्य सरकार पर कड़ा प्रहार भी है। लेकिन इन सबके बीच सवाल स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर भी है। सिविल सर्जन और उपायुक्त के पास शायद इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि 2012 से अब तक यह फाइल किन दफ्तरों की धूल फाँक रही थी। भ्रष्टाचार की बू इस खंडहर से साफ आती है। जब निर्माण अधूरा था, तो क्या इसकी कभी मॉनिटरिंग नहीं हुई? प्रतापपुर के यादव नगर टंडवा का यह अधूरा स्वास्थ्य केंद्र केवल एक भवन नहीं, बल्कि उस सिस्टम का प्रतीक है जो आधी-अधूरी योजनाओं पर चैन की नींद सो जाता है। अब जब सांसद कालीचरण सिंह ने इस मामले में हस्तक्षेप की बात कही है, तो ग्रामीणों की उम्मीदें एक बार फिर जाग उठी हैं। लेकिन सवाल वही है—क्या अगले 13 महीनों में यह भवन अस्पताल बन पाएगा, या फिर 13 साल की यह प्रतीक्षा और लंबी होगी?
